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खोज

में जानना चाहती हू तुमने ख़ुद को पहचाना कैसे  इस खोए  हुए दुनिया में सच क्या है  ये  जाना कैसे...
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में जानना चाहती हू तुमने ख़ुद को पहचाना कैसे 

इस खोए  हुए दुनिया में सच क्या है  ये  जाना कैसे । 

  जहाँ  वक़्त से जल्दी इंसान बदलते है

लोगो के हर मिनट जज़्बात बदलते है।

जहाँ पत्तो से ज़दा रंग इंसान बदलते है

जहाँ मोसम से तेज अंदाज़ बदलते है।

जहाँ रोते हुए को लाचार

और हस्ते हुए को अपना कहते है।

जहाँ जज़्बाती होने पर तुम्हे कमजोर कहते है

जहाँ ना रोने पर तुम्हे मज़बूत कहते है

जहाँ पैसे ना होने को गरीब कहते है

जहाँ इज़्ज़त बिक  जाने को “मशहूर “ होना कहते है ।

 जहाँ किताबों को रद्दी में देते है

जहाँ विश्वास में धोका देते है।

वहाँ !!

वहाँ !!

तुमने ख़ुद को ढूंढा कैसे ! ।